आज का दौर डिजिटल क्रांति का दौर है। इंटरनेट और स्मार्टफोन की सुलभता ने हमारी जीवनशैली को पूरी तरह बदल दिया है। जहाँ एक ओर तकनीक ने ज्ञान, शिक्षा और नए अवसरों के द्वार खोले हैं, वहीं दूसरी ओर इसके गैर-जिम्मेदाराना इस्तेमाल ने एक गंभीर संकट को जन्म दिया है। इस संकट का सबसे बड़ा शिकार आज का युवा वर्ग हो रहा है। विशेष रूप से, ‘ऑनलाइन गेमिंग’ (Online Gaming) की बढ़ती लत ने युवाओं के शारीरिक, मानसिक, वित्तीय और सामाजिक जीवन को दीमक की तरह चाटना शुरू कर दिया है। जो उम्र करियर बनाने, नए कौशल सीखने और समाज को नई दिशा देने की होती है, उसमें युवा स्क्रीन के सामने बैठकर वर्चुअल (आभासी) दुनिया में अपनी वास्तविक जिंदगी को दांव पर लगा रहे हैं।
मानसिक स्वास्थ्य और एकाग्रता पर प्रहार
ऑनलाइन गेमिंग की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि यह सीधे तौर पर दिमाग के ‘डोपामाइन’ (Dopamine) चक्र को प्रभावित करती है। पब्जी (PUBG), फ्री फायर (Free Fire) या कॉल ऑफ ड्यूटी जैसे गेम्स युवाओं को एक काल्पनिक जीत का झूठा अहसास कराते हैं। लगातार स्क्रीन के सामने रहने से युवाओं में चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन (अवसाद), अनिद्रा (Insomnia) और आक्रामकता बढ़ रही है। कई बार गेम में हार जाने या इंटरनेट की गति धीमी होने पर युवा इस कदर आपा खो बैठते हैं कि वे अपशब्दों का प्रयोग और हिंसक व्यवहार करने लगते हैं। मानसिक एकाग्रता का स्तर इतना गिर चुका है कि पढ़ाई या किसी गंभीर काम में युवाओं का मन अधिक देर तक नहीं टिक पाता।
शारीरिक स्वास्थ्य का पतन
एक समय था जब युवा मैदानों में जाकर फुटबॉल, क्रिकेट या कबड्डी जैसे खेल खेलते थे, जिससे उनका शारीरिक विकास होता था। आज मैदानी खेलों की जगह मोबाइल स्क्रीन ने ले ली है। घंटों एक ही मुद्रा में बैठकर गेम खेलने से युवाओं में मोटापा, आंखों की रोशनी कमजोर होना, पीठ व गर्दन में दर्द और कम उम्र में ही दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। शारीरिक गतिविधि शून्य होने के कारण उनका शरीर समय से पहले ही सुस्त और बीमारियों का घर बनता जा रहा है।
वित्तीय तबाही और साइबर अपराध का जाल
आजकल के कई ऑनलाइन गेम्स ‘फ्री-टू-प्ले’ की आड़ में आते हैं, लेकिन उनके अंदर विभिन्न फीचर्स, हथियार, या पोषाक (Skins) खरीदने के लिए पैसे खर्च करने पड़ते हैं। इतना ही नहीं, ‘रियल मनी गेमिंग’ (Real Money Gaming) जैसे कि फैंटेसी स्पोर्ट्स, पोकर और ऑनलाइन सट्टेबाजी के नाम पर युवाओं को रातों-रात अमीर बनने का लालच दिया जाता है। इस दलदल में फंसकर कई छात्र और युवा अपनी पढ़ाई की फीस, पॉकेट मनी और यहाँ तक कि अपने माता-पिता की गाढ़ी कमाई के लाखों रुपये गंवा चुके हैं। जब पैसे खत्म हो जाते हैं, तो युवा कर्ज लेने, चोरी करने या साइबर अपराधों में शामिल होने जैसी राह चुन लेते हैं। कई मामलों में वित्तीय नुकसान से तंग आकर युवाओं द्वारा आत्महत्या करने जैसी दुखद खबरें भी सामने आती हैं।
सामाजिक रिश्तों में बढ़ती दूरी
ऑनलाइन गेमिंग की लत युवाओं को उनके परिवार और दोस्तों से दूर कर देती है। वे अपने कमरे में बंद होकर आभासी दुनिया के अनजान खिलाड़ियों के साथ जुड़ना ज्यादा पसंद करते हैं, जबकि असल जिंदगी के रिश्तों से उनका कटाव हो जाता है। वे सामाजिक कार्यक्रमों, पारिवारिक बातचीत और वास्तविक बातचीत से कतराने लगते हैं। इस कारण उनमें सामाजिक कौशल (Social Skills) का विकास रुक जाता है और वे वास्तविक जीवन की चुनौतियों का सामना करने में असमर्थ साबित होने लगते हैं।
समय की बर्बादी और करियर का नुकसान
युवावस्था जीवन का वह पड़ाव है जहाँ लिया गया एक-एक निर्णय और बिताया गया एक-एक पल भविष्य की नींव रखता है। ऑनलाइन गेमिंग में घंटों बर्बाद करने के कारण प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र, नौकरीपेशा युवा और कॉलेज के विद्यार्थी अपने लक्ष्यों से भटक रहे हैं। जब समय हाथ से निकल जाता है, तब असफलता और बेरोजगारी के अलावा उनके पास कुछ नहीं बचता।
समाधान की दिशा में आवश्यक कदम
इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है:
- अभिभावकों की भूमिका: माता-पिता को बच्चों के स्क्रीन टाइम पर नजर रखनी चाहिए और उनके साथ दोस्ताना व्यवहार बनाकर उनकी गतिविधियों को समझना चाहिए।
- मैदानी खेलों को बढ़ावा: युवाओं को शारीरिक खेल-कूद, योग और रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।
- डिजिटल डिटॉक्स व जागरूकता: स्कूलों और कॉलेजों में साइबर सुरक्षा और डिजिटल डिटॉक्स (Digital Detox) पर कार्यशालाएं आयोजित की जानी चाहिए।
- कड़े कानून: सरकार को भ्रामक विज्ञापनों और पैसे वाले सट्टेबाजी वाले गेम्स पर सख्त कानून लागू करने चाहिए।
निष्कर्ष
ऑनलाइन गेमिंग अपने आप में पूरी तरह से बुरी नहीं है, यदि इसे एक सीमा और मनोरंजन के साधन के रूप में देखा जाए। लेकिन जब यह मनोरंजन लत में बदल जाता है, तो यह विनाश का कारण बनता है। आज के युवाओं को यह समझना होगा कि स्क्रीन के भीतर की आभासी जीत वास्तविक जीवन की सफलताओं का विकल्प नहीं हो सकती। यदि समय रहते युवा वर्ग इस लत से बाहर नहीं निकला, तो यह न केवल उनका व्यक्तिगत नुकसान होगा, बल्कि देश के भविष्य के लिए भी एक बड़ा आघात सिद्ध होगा।

