यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः, स पण्डितः स श्रुतवान् गुणज्ञः।
स एव वक्ता स च दर्शनीयः, सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति॥
(यह प्रसिद्ध श्लोक राजा भर्तृहरि द्वारा रचित ‘नीतिशतकम्’ से लिया गया है।)
शब्दार्थ और सरल भावार्थ
यस्यास्ति वित्तं: जिसके पास धन (रुपया-पैसा) है
स नरः कुलीनः: वही मनुष्य उच्च कुल का (सभ्य) माना जाता है
स पण्डितः: वही विद्वान है
स श्रुतवान्: वही शास्त्रों का ज्ञाता (ज्ञानी) है
गुणज्ञः: वही गुणों की परख करने वाला या गुणी है
स एव वक्ता: वही सबसे अच्छा वक्ता (बोलने वाला) माना जाता है
स च दर्शनीयः: वही देखने योग्य (सुंदर/आकर्षक) है
सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति: क्योंकि संसार के सभी गुण ‘कांचन’ अर्थात सोने (धन/रुपये) के आश्रित होते हैं।
सरल अर्थ: जिस व्यक्ति के पास पर्याप्त धन होता है, समाज उसी को कुलीन, विद्वान, शास्त्रज्ञ, गुणी, श्रेष्ठ वक्ता और दर्शनीय मानता है। संक्षेप में कहें तो दुनिया में सभी गुण धन के पीछे ही चलते हैं।
श्लोक का विस्तृत विश्लेषण और आज के समय में रुपये का महत्त्व
महाकवि भर्तृहरि ने इस श्लोक के माध्यम से सांसारिक जीवन का एक कड़वा, लेकिन शाश्वत सत्य सामने रखा है। प्राचीन काल में जिसे ‘वित्त’ या ‘कांचन’ कहा जाता था, आज के आधुनिक युग में वही ‘रुपया’, ‘पैसा’ या ‘करेंसी’ है। यह श्लोक बताता है कि समाज का दृष्टिकोण किसी व्यक्ति के चरित्र या ज्ञान से पहले उसकी आर्थिक स्थिति से तय होने लगता है।
१. सामाजिक प्रतिष्ठा और पहचान
व्यावहारिक जीवन में देखा जाए तो धन व्यक्ति को समाज में एक विशेष पहचान और सम्मान दिलाता है। श्लोक की पहली पंक्ति कहती है कि जिसके पास रुपया है, लोग बिना जांचे-परखे भी उसे बड़े कुल या अच्छे घराने का मान लेते हैं। आज के समय में भी जिस व्यक्ति के पास आर्थिक समृद्धि है, उसे बैठकों में सम्मानजनक स्थान दिया जाता है और उसकी बात को गंभीरता से सुना जाता है।
२. ज्ञान और योग्यता का मूल्यांकन
यदि कोई व्यक्ति बहुत विद्वान और गुणी है, लेकिन अत्यंत निर्धन है, तो अक्सर समाज उसके ज्ञान की अनदेखी कर देता है। इसके विपरीत, यदि किसी धनवान व्यक्ति के पास सामान्य ज्ञान भी हो, तो लोग उसकी साधारण बातों को भी महाज्ञान मानकर उसकी प्रशंसा करते हैं। लोग उसकी बातों को ध्यान से सुनते हैं और उसे एक सफल वक्ता का दर्जा दे देते हैं।
३. बाह्य सौंदर्य और आकर्षण
आर्थिक रूप से संपन्न व्यक्ति का रहन-सहन, पहनावा और जीवनशैली आकर्षक हो जाती है। श्लोक में ‘स च दर्शनीयः’ कहा गया है, जिसका अर्थ है कि धन व्यक्ति के व्यक्तित्व में एक अलग चमक ला देता है। जब व्यक्ति के पास जीवन की मूलभूत सुविधाओं और साधनों की कमी नहीं होती, तो उसका आत्मविश्वास स्वतः ही बढ़ जाता है।
४. सभी गुणों का आधार: धन
श्लोक का सबसे महत्त्वपूर्ण संदेश इसकी अंतिम पंक्ति में है—”सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति”। इसका अर्थ यह है कि भौतिक संसार में धर्म, कर्म, शिक्षा, स्वास्थ्य और समाज सेवा—इन सभी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए धन एक अनिवार्य माध्यम है। बिना रुपये के न तो अच्छी शिक्षा प्राप्त की जा सकती है, न ही किसी बीमार का इलाज कराया जा सकता है और न ही परिवार की जिम्मेदारियों को सुचारू रूप से निभाया जा सकता है।
निष्कर्ष
भर्तृहरि का यह श्लोक धन-लोलुपता या लालच को बढ़ावा नहीं देता, बल्कि यह व्यावहारिक दुनिया के एक यथार्थ (Reality) का दर्पण है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जीवन में आत्मसम्मान, परिवार की सुरक्षा, नैतिक कर्तव्यों के पालन और समाज में गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए अर्थ (रुपया/धन) का होना अत्यंत आवश्यक है। धन स्वयं में अंतिम लक्ष्य नहीं है, लेकिन जीवन के तमाम लक्ष्यों को प्राप्त करने का एक बहुत बड़ा और मजबूत साधन अवश्य है।